Monday, 9 August 2010

एक मार्मिक व्यथा...सुखद अंत के साथ.....


एक गंजे की व्यथा कुछ मार्मिक संवादों के माध्यम से.......

१. एक गंजा बड़ा भाई जो की स्मगलर है, अपने छोटे भाई जिसके पास बड़े बड़े लहराते बाल है को कहता है “हईई आज मेरे पास गाडी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है, तुम्हारे पास क्या है..”...छोटा भाई कमीनी मुस्कान के साथ कहता है “भाईइइइ .....मेरे पास पास बाल है “....बड़ा भाई यह जवाब सहन नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है ....

२. एक प्रेमी (जिसके सर पर बहुत कम बाल रह गए थे ) अपनी माशुका से इश्क फरमाते हुए कहता है “ डार्लिंग तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की में तुम्हे प्यार नहीं करता, आज में कसम खाकर कहता हूँ की जब तक मेरे सर पर अंतिम बाल मौजूद है, में तुम्हे इसी तरह प्यार करता रहूँगा”....प्रेमिका एक नजर उसके सर पर डालती है और कहती है “मुझे लगता है की अब मुझे नया प्रेमी देख लेना चाइये,क्योकि तुम तो ज्यादा दिन तक साथ नहीं निभा पाओगे..”

३. “आखिर दिया ही क्या है पिताजी आपने सिवाय इस hereditary की बीमारी के...क्या कसूर था आखिर मेरा, जो मुझे यह मिली (सर पर हाथ लगाकर सुबुकते हुए)...आज कोई भी लड़की मेरे सामने देखने तक को तैयार नहीं.....जब आपको पता ही था की यह सबको विरासत में मिल रही है तो फिर मुझे पैदा करने की जरुरत ही क्या थी....बताइए पिताजी बताइए, आज आप यु चुप नहीं रह सकते (पुन: सुबकते हुए)”...

४. “आज खुश तो बहुत होंगे तुम, हईईइइइ... की आज विजय दीनानाथ चौहान तुम्हारी चोखट पर खड़ा है, वो इंसान जिसने आज तक तुम्हारा नाम तक नही लिया, यही सोच कर तुमने मेरे बालो अत्याचार करने शुरू कर दिया की अब तो इसे मेरी दर पर आना ही पड़ेगा..है ना यही सोचकर तुमने इनको मेरे से छिनना शुरू कर दिया...अब तो बहुत खुश होंगे तुम..हईईई ई....तो लो आज में तुम्हारे दर पर खड़ा हू...अब करो इन्साफ..लौटा दो मुझे मेरे वो बाल, जिन पर मुझे नाज था..”

५. “नहीं माँ नहीं ...मत रुको मुझे..आह्हहह.......क्या करूँगा में अब रूककर..आह्ह्ह्ह्ह...जिसे देखो वो मेरे नाम की हंसी हँसे जा रहा है...जो समझदार है वो मुह फेर कर हसते है और जो नासमझ है वो मुह पर....अब तुम ही बताओ माँ कैसे सहू में यह जिल्लत भरी जिंदगी....आखिर कसूर क्या था मेरा...यही की मेरे बाल नहीं है....इसमें मेरी क्या गलती माँ, क्या गलती....पर माँ में वचन देता हू की अगले जनम में भी में तेरे कोख से ही जनम लूँगा, पर तू ध्यान रखना और बचपन से ही मेरे बालो का स्पेशल ध्यान रखना, ताकि यह नौबत फिर से ना आये...आह्ह्ह्ह्ह..में जा रहा हू माँ...”


पर इन संवादों का अंत इतना दुखद नहीं था....कुछ भी अनर्थ होने से पहले अचानक गांधीजी प्रकट होते है (हो सकता है भाई, मुना भाई में भी हुआ था), वो अपनी निर्मल वाणी में कहते है “क्या हुआ बेटा, किस के खोने के गम में तुम मरने का विचार ला रहे हो, इनके (सर पर हाथ रखते हुए), ये इस नश्वर शरीर का ऐसा हिस्सा है, जो कुछ काम का नहीं, अगर कुछ काम का है तो वो इसके अंदर रखा हुआ दिमाग....इसलिए इनके जाने का गम न करो, मुझे ही देख लो...आज चाहे किसके कितने ही बाल क्यों ना, लेकिन वो भागता तो मेरे फोटो वाले चंद टुकडो के पीछे ही है.....इस useless body part के जाने का शोक मनाने के बजाय, उठो और कुछ ऐसा करो की लोग तुमसे बात भी करे तो नजरे झुकाकर...फिर बालो की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जायेगा....”...इतना कहकर गांधीजी फिर से गायब हो गए....और रह गई उनकी अनमोल बातें...दुनिया के सभी गंजो के लिए प्रेरणादायक......सुखद अंत..... :)

2 comments:

  1. Yaar ye bata tu jab bhi kuch likhta hai aur sochta hai tera dhyan humesha hair par hi kyo rahta hai......? vaise pahli bar mei bahut achhi try ki hai...Lage raho.....

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